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Showing posts from July 14, 2016

HE NAARI ! TU HAI MAHAN...........

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                                      नारी की गरिमा                                        नारी के सम्बन्ध में जो कुछ भी वेद, स्मृति, इतिहास आदि में कहा गया है उस पर यदि आग्रह रहित हो गंभीरता से विचार किया जाए तो वह विवेक सम्मत, बुद्धि ग्राह्य एवँ आत्मप्रिय ही लगेगा, इसमें संदेह नहीं | यद्यपि विश्व में प्रचलित अन्य धर्मशास्त्रों में नारी को पुरुष के मनोरंजन की साधन सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथापि वैदिक धर्म के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता | वैदिक विचारधारा में न तो स्त्री पुरुष की दासी है और न वह उसके मनोरंजन की सामग्री ही, न तो वह पुरुष के पाँव की जूती है और न उसके सर का ताज ही | उसका उचित स्थान पुरुष का वामांग है | वह पुरुष की अर्धांगिनी है | **इस विषय में मनुस्मृति के सिद्धांतानुसार नारी की उत्पत्ति के प्रसंग में पूर्व में बताया जा चुका है | ...

HE NAARI ! TU HAI MAHAAN......

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                                                             पतिव्रता की परीक्षा        ये घटना उस समय की है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था | कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में जब शरद बाबू एम्.ए. में पढ़ते थे तब रोज नाम की एक यूरोपियन लड़की बी.ए. में पढ़ती थी | दोनों एक दुसरे को चाहने लगे | सहशिक्षा का यह अनिवार्य दुष्परिणाम है | सालभर बाद रोज के पिता जो एक व्यापारी फर्म में मैनेजर थे, पेंशन लेकर लंदन चले गए और मिस रोज भी उनके साथ चली गई | उसी साल शरद बाबू ने एम्.ए. पास किया और उनका विवाह सुशीला नाम की एक शिक्षिता तथा सुन्दरी कन्या से हो गया | विवाह के बाद वे इंजीनियरिंग पढ़ने लंदन चले गए | मिस रोज का पत्र व्यव्हार जारी ही था, इसलिए शरद बाबू को उसका पता ज्ञात था | एक साल बाद शरद बाबू ने अपने को कुआँरा बताकर मिस रोज के साथ बाकायदा रजिस्ट्री विवाह कर लिया |        इंजीयनियरिं...

शास्त्रीय संगीत भजन

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जागो मोहन प्यारे तुम जागो मोहन प्यारे तुम,  साँवरी सूरत मोरे मन भाए, सुन्दर लाल हमारे .... प्रातः समय उठ भानू उदय भयो,  ग्वाल बाल सब भूपत ठाड़े दरसन के सब भूखे प्यासे,  उठियो नंदकिशोर दुलारे जागो मोहन प्यारे तुम...... आयो रे आयो रे घनश्याम मुरारी, प्रीत लगी है तुम संग मोरी आन पड़े मोरे लाल मुरारी राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है माया को संग त्याग प्रभुजी के चरण लाग जगत सौख्य नाम झूठ मिथ्या सब साज है | कौन गली गयो श्याम बता दे सखी गोकुल ढूंढी वृन्दावन ढूंढी ढूंढी चारों धाम, बता दे सखी प्रभु बिन जीवन असार भासे देखिन चरण सुकोमल कैसे प्रभु कृपेने नटुनी चराचर देखिन मजसी गमे उपहासे | सुमिरन कर हरी नाम तू मनवा जीवन है दो दिन का सपना अंत समय कोई काम ना आवत गुरु प्रभु बिन कोई न अपना | तू ही सूर्य तू ही चन्द्र तू ही पवन तू ही अगन तू ही व्याप्त तू आकाश भावरुद्रग्र सर्व पशुपति सम समान ईशान भीम सकल तेरे ही अष्टनाम ...