HE NAARI ! TU HAI MAHAAN......

                                                            पतिव्रता की परीक्षा
       ये घटना उस समय की है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था | कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में जब शरद बाबू एम्.ए. में पढ़ते थे तब रोज नाम की एक यूरोपियन लड़की बी.ए. में पढ़ती थी | दोनों एक दुसरे को चाहने लगे | सहशिक्षा का यह अनिवार्य दुष्परिणाम है | सालभर बाद रोज के पिता जो एक व्यापारी फर्म में मैनेजर थे, पेंशन लेकर लंदन चले गए और मिस रोज भी उनके साथ चली गई | उसी साल शरद बाबू ने एम्.ए. पास किया और उनका विवाह सुशीला नाम की एक शिक्षिता तथा सुन्दरी कन्या से हो गया | विवाह के बाद वे इंजीनियरिंग पढ़ने लंदन चले गए | मिस रोज का पत्र व्यव्हार जारी ही था, इसलिए शरद बाबू को उसका पता ज्ञात था | एक साल बाद शरद बाबू ने अपने को कुआँरा बताकर मिस रोज के साथ बाकायदा रजिस्ट्री विवाह कर लिया |
       इंजीयनियरिंग पास करके शरद बाबू अपनी गोरी पत्नी रोज को साथ लेकर कलकत्ते आये और अलग से बालीगंज में एक बंगला खरीदकर रहने लगे | शरद बाबू प्रतिमास एक सप्ताह अपने घर पर पहली पत्नी सुशीला के साथ रहते थे | इसलिए वे मिस रोज से बहाना बनाते थे कि कभी सोनपुर का पुल कमजोर हो गया है उसका निरिक्षण करने जाना है, कभी बम्बई में काम है, कभी काशी में | रोज उनके बहानों को सच मान लेती थी | एक सप्ताह बाद जब वे रोज के पास आते तो कुछ-न-कुछ सौगात लाते, जिससे रोज को उनके बाहर जाने का निश्चय बना रहता था |
       जालसाजी बहुत दिनों तक नहीं चलती | एक दिन रोज के खानसामा ने शरद बाबू को कलकत्ता के बाज़ार में देख लिया | उसने रोज को कहा उसने चितरंजन रोड़ पर सफ़ेद मोटर में इंजिनियर साहब को एक सुन्दर बंगालिन महिला के साथ देखा है | रोज को विश्वास नहीं हुआ, उसने सोचा कि खानसामा को धोखा हुआ है | शरद बाबू जब आये तो रोज के लिए लखनऊ के खरबूजे लाये और लखनऊ स्टेशन का नक्शा कैसा बनाया गया है वह भी समझाया | रोज को खानसामा की बात गलत लगी, इसलिए वह बात आई गई हो गई |
       रोज जब कलकत्ता में पढ़ती थी तब उसकी नीरजा नाम की एक सहेली थी | एक दिन उसके यहाँ टी पार्टी थी | उसने रोज को भी आमंत्रित किया था | रोज आई और नीरजा के साथ फाटक पर खड़ी होकर आगतों का स्वागत करने लगी | रोज ने नीरजा को अपने विवाह की बात नहीं बताई | उसने क्रिस्चियन गर्ल्स स्कूल की प्रधानाध्यापिका के रूप में कलकत्ता में रहने का बहाना बनाया | इतने में सुशीला देवी भी वहाँ आई | नीरजा ने रोज को यह कहकर उनका परिचय दिया कि, ये समस्त गुणों की निधान, परम सती, और विदुषी हैं और लंदन से इंजीनियरिंग पास करनेवाले श्री शरदचन्द्र घोष इनके पति हैं | यह सुनकर रोज पर जैसे वज्रपात हो गया | खानसामा वाली बात उसे याद आ गई | वही सफ़ेद मोटर वही बंगाली महिला |
       रोज जब घर पहुँची तो शरद बाबू उसका इंतजार कर रहे थे | उन्होंने रोज को पूछा कि वो इतनी शोकाकुल क्यों है ? क्या कोई दुर्घटना घटी है ? रोज ने उनसे सीधा सुशीला के साथ उनके सम्बन्ध के बारे में पूछा | जब शरद बाबु ने कहा कि सुशीला से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है तो रोज ने उनसे कहा कि, वो उनपर ४२० का केस चलाएगी और उनसे तलाक भी लेगी | रोज के ऐसा कहने पर शरद बाबू ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और रोज से अदालत में न जाने का आग्रह किया | इस पर रोज ने दोनों में से एक को तलाक देने की शर्त रखी | शरद बाबू किसीको भी तलाक देने को तैयार नहीं थे, बदले में रोज को एक लाख रुपये जुर्माना देने को तैयार थे जिससे बात अदालत तक न पहुँचे और उनकी प्रतिष्ठा भी बनी रहे | परन्तु रोज नहीं मानी और उसने केस कर दिया |
       रोजवाला मुकद्दमा अख़बारों में छप चुका था | रोज ने शरद बाबू पर ४२० और तलाक के दो मुकद्दमे चलाये | ‘स्टेट्समैन’ तथा ‘इंग्लिशमैन’ ने रोज का पक्ष लेकर संपादकीय नोट लिख दिए | मैजिस्ट्रेट भी अंग्रेज ही था | शहर के सभी गणमान्य अदालत में उपस्थित थे | आज सुशीला कुमारी की गवाही होनेवाली है | मुद्दई तथा मुद्दालेह के कटघरे में शरद तथा रोज खड़े हैं | दोनों पक्षों के बैरिस्टर भी तैयार हैं | सुशीला कुमारी को गवाही देने के लिए अदालत ने बुलाया | शरद बाबू को लगा कि, उनपर राहू और केतु दोनों ने चढ़ाई कर दी है | वो सोचने लगे कि सुशीला की गवाही से मुझे तीन साल की सजा होगी और रोज को तलाक मिल जायेगा, प्रतिष्ठा भी गई और दोनों पत्नियां भी गईं, उसके बाद नौकरी रहेगी की नहीं पता नहीं |
शरद बाबू इश्वर को प्रार्थना करने लगे कि “हे इश्वर ! आपने बड़े बड़े संकट दूर किये थे ! सुना है गज का संकट अथाह और मूक संकट था, जिसे आपने काट डाला था | मैं आपका भक्त तो नहीं हूँ, बल्कि आपकी सत्ता में भी संशय रखता हूँ | अदालत में मेरी परीक्षा हो रही है | जैसे आपने गज को उबारा था वैसे ही, हे दीनानाथ ! आज मुझे भी उबार लीजिये | यदि आज अदालत में मैं बच गया तो आज से मेरे बराबर आस्तिक कोई न होगा“ |
       बसंती साड़ी पहने सुशीला देवी अदालत में आई | उसने एक बार अपने पति का मलिन मुख देखा और फिर रोज का अभिमान भरा चेहरा देखा | अदालत में सन्नाटा छा गया |
       मजिस्ट्रेट ने पूछा – तुम्हारा नाम ?
       सुशीला – सुशीला कुमारी |
       मजि. – तुम अभियुक्त शरद चन्द्र घोष के मकान में रहती हो ?
       सुशीला – जी हाँ |                  
       मजि. – तुम अभियुक्त की विवाहिता स्त्री हो ?
       सुशीला – जी नहीं |
       मजि. – तो क्या रखेल की हैसियत से रहती हो ?
       सुशीला – जी हाँ |
       मजि. – तुमको क्या वेतन मिलता है ?
       सुशीला – साढ़े तीन सौ मासिक |
मजि. – तुमको यह मालूम है कि शरद बाबू ने रोज के साथ बाकायदा विवाह किया है ?
       सुशीला – जी हाँ |
       मजि. – क्या यह ब्याह शरद बाबू ने तुम्हारी मंजूरी से किया था ?
       सुशीला – जी हाँ |
       मजि. – तुमको शरद बाबू से कोई शिकायत है ?
       सुशीला – जी नहीं |
       मजि. – तुम अब भी उनसे प्रेम करोगी ?
       सुशीला – जी हाँ |


                                                     




 मुकद्दमा ख़ारिज हो गया और शरद बाबू ससम्मान बरी किये गए | श्रीमती रोज की तलाक की दरखास्त ख़ारिज हो गई |
ये है भारतीय संस्कृति और भारतीय नारी | विवाहिता सुशीला ने अपने प्रतिष्ठा की परवाह न कर अपने पति की प्रतिष्ठा की रक्षा की | एक हिन्दू नारी का यह एक महान त्याग ही कहा जायेगा | यदि भारत में नारी की यह त्यागभावना न रह जाय तो पतिव्रता धर्म ही मर जाय | सुशीला ने अपनी प्रतिष्ठा का बलिदान देकर, अपनी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ा ली कि रोज को भी यह अनुभव हो गया कि प्रेम का सच्चा तत्त्व और उसका व्यव्हार तो हिन्दू नारी ही जानती है |

बहनों यह घटना कलियुग की ही ही | जो बहनें यह मानती है की पतिव्रता नारी की बातें तो पुराने ज़माने की बात है तो यह उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि आधुनिक काल में भी ऐसी पढ़ी लिखी एवँ पतिव्रता नारियाँ हैं जिन्होंने अपने पातिव्रत धर्म को कलियुग में भी अक्षुण्ण बनाये रखा है | 
                                  

                                 

Comments

Popular posts from this blog

शकुंतला को दिया गया उपदेश

महिला संत जीवन चरित्र