शकुंतला को दिया गया उपदेश
शकुंतला
को दिया गया उपदेश
प्रसिद्द चक्रवर्ती
सम्राट भरत की माता शकुन्तला ऋषि कण्व की
पुत्री थी | राजा दुष्यन्त से विवाह होने के उपरान्त कण्व ने उसे जो उपदेश दिया है उसी का उल्लेख महाकवि
कालिदास ने ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ में किया है | वह उपदेश वधु के लिये गृहस्थाश्रम में
पत्नी के कर्तव्यों का ज्ञान करानेवाला साररूप वर्णन है |
ऋषि कण्व
के उपदेश को कालिदासजी ने एक श्लोक के द्वारा प्रस्तुत किया है |
शश्रूषस्व गुरून् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने,
भर्तुर्विप्रकृताSपि रोषणतया मा
स्म प्रतीपं गम: |
भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने
भाग्येष्वनुत्सेकिनी,
यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा: कुलस्याधय: ||
अर्थात – ससुराल में जाकर तुम इन बातों का पालन करना | जो पत्नियाँ इन
बातों का पालन करती हैं, वे ‘गृहिणी’ के सम्मानजनक स्थान को प्राप्त करती हैं और
जो इनका पालन नहीं करतीं वे उस घर में क्लेश या मानसिक रोग रूप सिद्ध होती हैं | वे
बातें हैं :-
१) गुरून् शश्रूषस्व – ससुराल में सास-ससुर आदि बड़ों की सेवा-संभाल करना |
२) सपत्नीजने प्रियसखीवृत्तिं कुरु – यदि पति की अन्य पत्नियाँ हों तो उनके साथ सहेली के समान मित्रता का
व्यव्हार करना | कालिदासजी के समय में राजा कई-कई विवाह कर लेते थे, अतः उस स्थिति
में वधू का क्या कर्त्तव्य है, इसका उल्लेख कालिदासजी ने किया है |
३) भर्तुर्विप्रकृता अपि रोषणतया प्रतीपं मा स्म गम: - पति के द्वारा कभी उपेक्षा किये जाने के कारण क्रोध में
आकर उसके प्रतिकूल (उल्टा बोलना, बदले का व्यव्हार करना, हठ करना, रुष्ट होना आदि)
आचरण मत करना | ऐसी स्थिति में सहनशक्ति का प्रदर्शन करके, पति के शांत होने पर
उसे समझाना अधिक फलदायक और व्यावहारिक होता है |
४) परिजने भूयिष्ठं दक्षिणा भव – सेवक और सेविकाओं के प्रति उदारता और दया का भाव रखना |
५) भाग्येषु अनुत्सेकिनी – सौभाग्य में अथवा धन-ऐश्वर्य की अधिकता में अभिमान न करना |
ऐसी पत्नी पति को प्रिय और अन्य सभी के सम्मान की पात्र
बनती है |
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