महिला संत जीवन चरित्र
भक्त बहिणाबाई
महाराष्ट्र में तीन शताब्दी पूर्व सन-१६२८
में स्त्री संत बहिणाबाई का उज्जवल जीवन चरित्र प्रकाश में आया | सुप्रसिद्ध
एल्लोरा की गुफाओं वाले क्षेत्र में वेरुल के निकट देवगांव है | वहाँ से इस जीवन
कथा का आरम्भ हुआ |
यह स्थान प्राचीन काल से देवताओं की नगरी
कहलाता है | शिव नदी पास ही निरंतर बहती है | तीर्थ स्नान के लिए यह स्थान अन्य
पवित्र तीर्थ स्थानों के सामान ही पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण माना गया है | इसी कारण
इसे लक्ष तीर्थ के नाम से जाना जाता है | महर्षि अगस्त्य ने वरदान दिया था कि इस
तीर्थ पर जो भी भक्तगण आकर स्नान, पूजन व प्रार्थना करेंगे उन्हें मनोवांछित फल
प्राप्त होगा |
इसी पवित्र देवगांव में आउजी कुलकर्णी नामक
एक ब्राह्मण रहते थे | वह सीधे सरल एवं भाग्यशाली व्यक्ति थे | उनकी पत्नी
जानकीबाई एक श्रेष्ठ गृहिणी थी | इनकी कोई संतान नहीं थी | इसी कारण इस दम्पत्ति
ने लक्ष तीर्थ पर संतान प्राप्ति हेतू पूजन किया | इस तपस्या के फलस्वरूप आउजी को
तीन स्वप्न में दिखाई दिया कि एक पूज्य ब्राह्मण उन्हें दो पुत्र एवं एक पुत्री का
आशिर्वाद दे रहे हैं | एक साल में ही अर्थात सन-१६२८ में उनके घर एक कन्यारत्न ने
जन्म लिया और उसus कन्या का नाम ‘बहिणा’ रखा गया |
हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार कुल-पुरोहित
विश्वेश्वर ने कन्या की जन्म कुण्डली बनाई और भविष्यवाणी की, कि वह बहुत भाग्यशाली
होगी |
समय के साथ बहिणा अब चार वर्ष की हो चुकी थी
कि उसकी सगाई गंगाधर पाठक नामक ३० वर्षीय व्यक्ति से कर दी गई जो कुलकर्णी परिवार
से सम्बंधित थे | गंगाधर पाठक शिवपुर में रहते थे | वह चार वर्ष तो शांतिपूर्वक
बीत गए, किन्तु कालान्तर में बहिणा के पिता पारिवारिक संपत्ति के झगड़े में फंस गए,
जिसके फलस्वरूप परिवार को गरीबी तथा पारिवारिक कलह के कुपरिणाम भुगतने पड़े |
गंगाधर उनकी सहायता के लिए आए | अंत में सोच विचारकर यही निष्कर्ष निकाला गया कि
बहिणा के परिवार के लिए गाँव छोड़कर अन्यत्र चले जाने के अतिरिक्त और कोई दूसरा
मार्ग नहीं है | अतः एक दिन रात के समय गंगाधर पाठक सहित आउजी परिवार ने देवगांव
छोड़ दिया | गाँव छोड़ देने के बाद उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, यहाँ तक
कि भिक्षा भी मांगनी पड़ी | कहा भी गया है की सच्चाई के मार्ग पर चलनेवालों को बहुत
कष्ट झेलने पड़ते हैं | अपनी इस यात्रा में इस परिवार ने कई तीर्थ स्थानों के दर्शन
किये और पवित्र नदियों में स्नान किया | तीर्थ स्थानों के दर्शन से बहिणाबाई को
बड़ा हर्ष होता था | पंढरपुर जो महाराष्ट्र की वाराणसी कहलाता है, में वे पांच दिन
ठहरे | भगवान पांडुरंग की प्रतिमा को देख कर बहिणा को अपार आनंद मिला | इसके
उपरान्त वे भगवान शिव की चरण राज से पवित्र हुए महादेव वन को गए | ब्राह्मण होने
के नाते ये लोग भिक्षा में केवल बिना पकाया हुआ अन्न ही लेते थे | इस प्रकार चलते
चलते वे रहिमतपुर में बसने के लिए विवश हुए | सौभाग्य से गाँव का पुजारी वाराणसी
गया हुआ था, अतः गंगाधर को पुजारी का काम सौंपा गया |
समय के साथ साथ बहिणा ग्यारह वर्ष की हो गई
थी | उसे साधू सन्यासियों के सत्संग सुनना तथा उनकी संगती ही अधिक रुचिकर लगती थी
| पड़ोस की लडकियां जब उसके साथ खेलने के लिए आतीं तो देखती कि वह प्रभु के चिंतन
में लीन है | लगता था पूर्व जन्म में इश्वर प्राप्ति के यत्न से अतृप्त बहिणा अपने
इस जीवन को इश्वर के ध्यान में बिताना चाहती थी (इश्वर प्राप्ति के अधूरे लक्ष्य
को बहिणा इस जन्म पूरी तरह इश्वर में डूबकर पूरा करना चाहती थी) | इश्वर प्राप्ति
की इच्छा ही उसका सबसे बड़ा खेल था |
गाँव के पुरोहित के वाराणसी से लौटने पर
गंगाधर को पुजारी के काम से निवृत्त कर दिया गया | आय का अब अन्य कोई साधन न होने
के कारण यह परिवार सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थान कोल्हापुर चला गया | यहीं के बहिणा के
जीवन का मुख्य अध्याय शुरू होता है|
कोल्हापुर में ब्रह्मभट्ट नामक एक ब्राह्मण
रहते थे जो वेद और शास्त्रों के ज्ञाता थे | उन्होंने दया करके आउजी परिवार को
आश्रय प्रदान किया | ब्रह्मभट्ट के घर में रहने के कारण आउजी परिवार को भी हरी
कीर्तन करने तथा पुराणों की कथा सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ | इसी नगर में जयराम
स्वामी भी रहा करते थे जो भागवत एवं पुराण आदि की कथाएं करते थे| उनसे पौराणिक
कथाएँ सुनकर बहिणा के ह्रदय में भगवद पूजन, ध्यान आदि की इच्छा अधिक बलवती होती गई
|
ब्रह्मभट्ट को किसी पर्व पर एक काले गहरे रंग
की गाय दान में मिली | उसके सींग मुलम्मा से मढ़े हुए थे, खुरों पर चांदी मढ़ी हुई
थी | उसकी पीठ पर पीली रेशमी झूल पड़ी हुई थी|
उस समय के दान की परम्परा के
अनुसार यह विशिष्ट प्रकार की भेंट थी | इस गाय ने एक काला बछड़ा भी दिया | बछड़े के
जन्म के दस दिन बाद ब्रह्मभट्ट के मन में यह विचार आया कि वह यह गाय गंगाधर को दान
कर दे | अतः उसने गाय दान का दी | गाय को पाकर ब्राह्मण परिवार बड़ा प्रसन्न हुआ | बछड़े
को बहिणा से बड़ा प्रेम हो गया | वह जहाँ भी जाती बछड़ा उसके साथ जाता | उसी के
हाथों से चारा पानी खाता पीता था और जब वह जल भरने जाती तब भी उसके साथ ही जाता | बछड़े
की प्रत्येक बात बहिणा उसी प्रकार समझ जाती थी जिस प्रकार कोई बच्चा अपने पालतू
पशु की भाषा समझ जाता है | बहिणा को पता चल गया कि बछड़े को कीर्तन के प्रति
श्रद्धा है, क्योंकि जब कभी वह कीर्तन में जाती तो बछड़ा उसके साथ जाता था | वह
सत्संग में भी बहुत सावधानी से बैठा रहता, किसी को भी बछड़े के कारण कष्ट नहीं होता
था | विचार करने के उपरान्त बहिणा एवं अन्य भक्तजनों ने यह मान लिया कि बछड़े में
किसी योग भ्रष्ट व्यक्ति की आत्मा है |
कोल्हापुर में जयराम स्वामी का कीर्तन बहुत
जनप्रिय हो गया था | बहिणा कीर्तन में भाग लेती थी | वह और उसका बछड़ा नगर में
चर्चा का विषय बन गए थे | यद्यपि उसका पति भक्तिभाव वाला था किन्तु उसका स्वभाव
जाता तेज था | उसकी पत्नी समाज में चर्चा का विषय बने यह बात उसे स्वीकार नहीं थी
| एक दिन ऐसी ही चर्चा सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया | वह दौड़ता हुआ घर गया और बहिणा के
बाल पकड़कर उसे बहुत मारा | गाय और उसका बछड़ा भी रंभाने लगे | पति के इस व्यव्हार
से बहिणा को बड़ा दुःख हुआ | बहिणा जो केवल ग्यारह वर्ष की बालिका थी अपने ३७
वर्षीय पति का विरोध करती भी कैसे | वह सोचने लगी की आखिर उसने ऐसी कौनसी गलती की
है | उसके माता पिता भी उसके पति को शांत करने में असमर्थ रहे, उन्होंने उससे
क्रोध का कारण जानना चाहा | तब उसके ईर्ष्यालु पति ने क्रोधित होकर उत्तर दिया “जयराम स्वामी में
क्या विशेषता है ? हरि कीर्तन की इतनी अधिक चिन्ता कौन करता है ? अगर उसने दुबारा
कीर्तन में जाने के लिए कदम उठाया तो मैं उसे फिर पिटूँगा” | तब से वह अक्सर
बहिणा को मारा पीटा करता था |
ब्रह्मभट्ट जो
परिवार का मुखिया था, उससे गंगाधर का यह व्यव्हार सहन नहीं हुआ | उसने एक दिन
गंगाधर से घर छोड़कर तत्काल चले जाने को कहा | परिणाम स्वरुप कुछ दिन तक घर में
शांति बनी रही | अचानक गाय का बछड़ा बहुत बीमार हो गया | हर तरह से चिकित्सा करने
पर भी उसे बचाने के प्रयास निष्फल रहे | उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे | बहिणा को उससे
अधिक प्रेम था, अतः वह उसके अंतिम शब्दों को समझ रही थी | उसे लगा मानों बछड़ा
इश्वर से प्रार्थना कर रहा है | दूसरे दिन बछड़े ने अपने प्राण त्याग दिए | बहिणा के
ह्रदय पर इस घटना का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा | वह तीन दिन तक बेहोश पड़ी रही | चौथे
दिन उसे ऐसा आभास हुआ मानो एक ब्राह्मण उसे जगाकर कर रहा है “बहिणा उठो ! विचार
करना आरम्भ करो ! तुम्हारे में ज्ञानोदय होना चाहिए !”
बहिणा ने जब
आँखे खोलीं तो देखा दीपक जल रहा है, अर्ध रात्रि के समय में उसके माता-पिता, भाई
और पति घबराये हुए उसके पास बैठे हैं | स्वप्न में बहिणा ने जिस ब्राह्मण को देखा
था वह पंढरपुर के पांडुरंग के प्रतिबिम्ब के सामान था | तदुपरान्त बहिणा की स्मृति
में केवल देवताओं और संतों की प्रतिमाएँ, उनकी कहानियाँ
और पद ही शेष रह गए थे | उसका मन महाराष्ट्र के प्रसिद्द संत तुकाराम के दर्शनों
के लालायित हो उठा | उसने यह घोषणा कर दी कि तुकाराम ही मेरे गुरु हैं | उनसे
दीक्षा पाए बिना वह जल बिन मछ्लेगी की तरह तड़पती रहेगी |
उसने तुकारामजी के बारे में सुना था कि किसी
ब्राह्मण की इच्छा रखने के लिए उन्होंने अपनी काव्य पुस्तक की पाण्डुलिपि गहरे जल
में बहा दी थी और तेरह दिन बाद जब वही पाण्डुलिपि निकाली गई तो वह ज्यों की त्यों
प्राप्त हुई | अपने समय के विभिन्न विचारकों एवं सत्पुरुषों में केवल उन्होंने ही
मराठी भाषा में जन साधारण के लिए वेदान्त का सार प्रस्तुत किया | अपने गुरु का
स्मरण करके बहिणा फिर अचेत हो
गई | बछड़े की मृत्यु के १७ दिन, बहिणा ने संत तुकारामजी के दर्शन स्वप्नास्वथा में
किये | संत ने बहिणा को धैर्य दिलाते हुए “राम कृष्ण हरी” का मंत्र दिया |
अध्यात्मिक
ज्ञान की प्राप्ति हेतु संत तुकारामजी ने बहिणाबाई का मार्गदर्शन किया | बहिणा की
अचेतावस्था में एक दिन जयराम स्वामी उसे देखने आए | बहिणा की शैय्या के समीप बैठे
बैठे जयराम स्वामी कुछ देर के लिए समाधिस्थ हो गए | अचानक बहिणा ने अनुभव किया कि
संत तुकारामजी उससे कह रहे हैं “मैं स्वामी जयराम से मिलने आया हूँ | यहाँ मैंने तुम्हें
देखा| मुक्ति
के लिए तुम्हारी उत्कट इच्छा की मैं प्रशंसा करता हूँ | अब यहाँ मत रुको |
आत्म-ज्ञान और आत्म अनुभूति के लिए यत्न करो |” इस प्रकार अनेक बार बहिणा को संत की छवि दिखाई दी, किन्तु
अधिकांश लोग इसे बहिणा का पागलपन
ही समझते थे | लोग झुंड बनाकर आते और उसके बारे पूछते | कुछ बहिणा के सात्विक जीवन
की प्रशंसा भी करते | गंगाधर जैसे ईर्ष्यालु स्वाभाव के व्यक्ति को अपनी पत्नी के
बारे में उत्सुक जन समूह का घर में इस तरह आना-जाना बिलकुल पसंद नहीं था | उसे यह
भी पसंद नहीं था कि उसके जैसे कर्मकाण्डी ब्राह्मण की पत्नी का गुरु तुकाराम जैसा
शूद्र व्यक्ति हो | उसे यह लगने लगा की तुकाराम ने उसकी पारिवारिक जीवन जड़ें हिला
दी है| अपनी पत्नी की लोकप्रियता और पत्नी के सामने अपनी उपेक्षा उससे सहन नहीं
होती थी | पति का सहज स्वाभिमान पत्नी की ख्याति के आगे झुकने को तैयार न था | ऐसे
घर में जहाँ उसका प्रभाव दिन प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा था, वहां ठहरना उसके लिए असंभव
हो गया था |
एक दिन बड़े
विनम्र भाव से उसने श्वसुर से कहा “आपकी पुत्री यानी मेरी पत्नी यद्यपि अब गर्भवती है फिर भी
मैंने उसे आपके पास छोड़ देने का निश्चय कर लिया है | मैं अब तीर्थ यात्रा के लिए
जाऊँगा | इसका कारण है पत्नी की इश्वर प्राप्ति की प्रबल इच्छा तथा तुकाराम गुरु
के प्रति अनावश्यक श्रद्धा | मैं अब नहीं लौटूंगा | मैं अब उसका मुँह नहीं देखूंगा
| अपनी ही पत्नी द्वारा अपना अपना सहने के लिए कौन तैयार होगा !”
विदाई के दिन
अचानक गंगाधर बीमार हो गया | वह सात दिन तक तेज बुखार में पड़ा रहा | उसने न भोजन
ग्रहण किया और न दवा ही | बहिणा रात-दिन उसकी सेवा करती रहती| गंगाधर को बहुत कष्ट
हो रहा था | उसे बड़ा पश्चाताप होने लगा | उसे लगने लगा की यह शारीरिक कष्ट उसे
भगवान पांडुरंग एवं उनके भक्त तुकाराम के अपमान के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ है | ऐसी
स्थिति में संभवतः उसकी आत्मा ही कह रही थी “तू क्यों मर रहा
है ? अगर तू जीवित रहना चाहता है तो अपनी पत्नी को अंगीकार कर ले | उसने तेरा क्या
बिगाड़ा है ? वह तो सच्ची इश्वर भक्त है | तुम्हें भी उसके साथ मिलकर इश्वर भक्ति
में जुट जाना चाहिए |” यह सन्देश उसने बहिणा की उपस्थिति में ही सुना | इसके बाद
ही गंगाधर स्वस्थ होने लगा, यह देखकर बहिणा को बड़ा आश्चर्य हुआ | गंगाधर को लगा कि
उसका पुनर्जन्म हुआ है और वह हरी की भक्ति में लग गया | उसने अपने श्वसुर से कहा
कि वे देवगांव लौट जाएँ तथा उसे और उसकी पत्नी को वन में तपस्या करने की आज्ञा दें
|
इस घटना के
उपरांत इस ब्राह्मण परिवार ने पुणे के निकट देहु नामक तीर्थ स्थान पर जाकर संत
तुकारामजी के दर्शन करने की ठानी | उनकी गाय भी उनके साथ गई | इंद्रायणी में स्नान
करने के पश्चात उन्होंने संत तुकारामजी के दर्शन किये | usउस समय संत तुकारामजी
मंदिर में बैठे पूजा कर रहे थे | बहिणा को संत तुकारामजी के दर्शन करके, जिन्हें
उसने कोल्हापुर में अपनी ध्यानावस्था में देखा था अपार शांति और आनंद प्राप्त हुआ |
दर्शन करते ही उसमें भावनात्मक परिवर्तन हुआ | द्वैत की भावना मिट गई | उसकी
बुद्धि स्थिर हो गई और ह्रदय निष्काम हो गया | usउस अनुभूति का वर्णन करते हुए
बहिणा ने कहा “संत तुकारामजी के दर्शन पाते ही मेरा अहं और सांसारिक
व्याधियों का बोझ नष्ट हो गया |”
देहु में उनके
लिए कोंडाजी नामक ब्राह्मण द्वारा भोजन की व्यवस्था तो हो गई परन्तु आवास की
व्यवस्था न हो सकी | माम्बाजी स्वामी से, जो पड़ोस में ही रहते थे और बहुत बड़े मकान
के स्वामी थे, गंगाधर ने स्थान देने की प्रार्थना की | उन्होंने गंगाधर को डंडे
मारकर निकाल दिया | तब वे मंदिर में यात्रियों के ठहरने के स्थान में ही रहने लगे
| वहाँ वे बहुत शांतिपूर्वक रहते और संत तुकारामजी का हरि कीर्तन सुनते |
माम्बाजी स्वामी
क्रोधी, ईर्ष्यालु और अहंकारी स्वाभाव के व्यक्ति थे | वह अपने को देहु का प्रमुख
नागरिक समझते थे | तुकारामजी से, जो किसी भी विद्या के ज्ञाता होने का दंभ नहीं
करते थे, बहुत लोग मिलने आते थे | माम्बाजी को यह सब देखकर जलन होती थी | उसने
गंगाधर और उसकी पत्नी से अनुरोध किया कि वे उसके शिष्य बन जाएँ | उन्होंने उत्तर
दिया कि हम संत तुकारामजी को अपना गुरु मानते हैं | यह सुनकर माम्बाजी ने उनकी
भर्त्सना करते हुए कहा कि “अरे ! तुम ब्राह्मण होकर भला शुद्र तुकाराम को अपना गुरु
कैसे मानते हो ? क्या अब शुद्र को भी ब्रह्म-ज्ञान पाने का अधिकार प्राप्त हो गया
है ? याद रखो इसके कारण तुम्हारा जाती बहिष्कार किया जायेगा |” तत्पश्चात वह इस परिवार का विरोधी हो गया और हर समय गंगाधर
तथा उसकी पत्नी को बुरा भला कहने लगा | बहिणा ने इससे प्रेरित होकर कहा था “ परीक्षा की
दृष्टि से प्रभु हमें कई प्रकार से कष्ट भोगने पर विवश करता है” | बहिना का कथन
यथार्थ ही है | संतों और महापुरुषों को बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता
है | संत तुकारामजी को भी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा था |
संत तुकारामजी
की बढती हुई ख्याति को देखकर माम्बाजी ने पुणे के अप्पाजी स्वामी को पत्र लिखकर
सूचित किया कि “तुकाराम जैसे शूद्र की इतनी हिम्मत बढ़ गई है कि वह मंदिर
में कीर्तन करता है | मंदिर में ही रहनेवाला ब्राह्मण परिवार उसको पूज्य मानता है” | पत्र में
माम्बाजी ने बहिणाबाई तथा गंगाधर के नाम का उल्लेख किया और अप्पाजी स्वामी से
अनुरोध किया कि वे तुकाराम के लिए दण्ड की व्यवस्था करें |
ब्राह्मण का गुरु
एक शुद्र व्यक्ति हो, यह बात uउस समय में किसी भी व्यक्ति को सहज स्वीकार हो यह
संभव नहीं था, क्योंकि usउस समय ब्राह्मणों का समाज में अधिक वर्चस्व था | अतः
अप्पाजी स्वामी का ऐसा समाचार पाकर क्रोधित होना स्वाभाविक था | उन्होंने ब्राह्मण
परिवार को जाति से बाहर करने की घोषणा कर दी | अप्पाजी स्वामी का निर्णय सुनकर
माम्बाजी ने बहिणा के परिवार को वह स्थान छोड़कर अन्यत्र चले जाने की आज्ञा दी |
बहिणा के परिवार
की गाय उनके साथ ही थी | एक दिन माम्बाजी ने उन्हें परेशान करने की दृष्टि से गाय
चुरा ली | उसने उस गाय को बड़ी निर्दयता से बांधकर अपने घर के किसी कोने में छिपा
दिया | गाय को तीन दिन तक भूखा और प्यासा रखा गया | इतना ही नहीं वह बंधी हुई गाय
को बहुत पीटता भी था | बहिणा गाय के लिए अधीर हो गई | गंगाधर ने गाय की खोज करने
के लिए कोई भी कसर बाकी नहीं रखी | इधर संत तुकारामजी को स्वप्न में बहिणा की गाय
दिखाई दी जो छुटकारा पाने के लिए उनसे याचना कर रही थी | जब भी गाय को मार पड़ती,
आत्मिक एकरूपता के कारण तुकारामजी के शरीर पर सुजन आ जाती |
एक दिन अचानक
माम्बाजी के घर आग लग गई | गाँव के लोग सहायता के लिए दौड़े और आग बुझा दी गई | जो
लोग वहां सहायता के लिए गए थे उन्होंने वहां विपत्ति में पड़ी गाय के रम्भाने की
आवाज़ सुनी | गाय को जलने से तो बचा लिया गया, परन्तु जब लोगों ने यह देखा की मार
पड़ने के कारण गाय की पीठ पर जैसे निशान पड़े थे, वैसे ही निशान संत तुकारामजी के
शरीर पर भी हैं तो सबको ही बड़ा आश्चर्य हुआ | तब लोगों की संत तुकारामजी के प्रति
श्रद्धा और भी अधिक बढ़ गई और वे लोग उन्हें भगवान पांडुरंग के समान ही पूजनीय
मानने लगे |
तत्पश्चात बहिणा
ने एक कन्यारत्न को जन्म दिया जिसका नाम काशीबाई रखा गया | बहिणा को ऐसा आभास हुआ
कि काले बछड़े ने ही कन्या के रूप में उसकी कोख से जन्म लिया है| स्वभावतः हर माँ
बच्चे के जन्म पर प्रसन्न होती है, परन्तु बहिणा अपने स्वाभाव के अनुसार उदासीन ही
बनी रही | उनके मन में बहुत बार यह विचार आता कि स्त्री होने के नाते वह सांसारिक
घर गृहस्थी के झंझटों से छूट नहीं पा रही हैं और यही उनकी अध्यात्मिक उन्नति में
सबसे बड़ा अवरोध है | उनके आसपास ऐसे सम्बन्धियों और साथियों का घेरा है जो अध्यात्मिक
ज्ञान प्राप्ति के लिए की जानेवाली तपस्या के विरोधी हैं | उनके पति यद्यपि
वेदान्ती हैं तथापि उनमें इश्वर प्राप्ति की सच्ची लगन नहीं है | usउस विरोधी
वातावरण से उन्हें असह्य वेदना होती जिसके कारण उन्हें बहुत बार आत्महत्या करने का
विचार आता | उनकी आत्मा देह के बंधन के मुक्त होने के लिए तड़प रही थी | उनके मन
में आता कि नदी के गहरे पानी में जाकर डूब जाय या चिता में जलकर भस्म हो जाय | एक
दिन ऐसी ही असह्य वेदना से दु:खी होकर उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की कि “हे प्रभु ! तुम
मुझे पति के माध्यम से चिढ़ा रहे हो किन्तु मैं तुम्हारी भक्ति नहीं छोडूंगी, चाहे
मेरे प्राण ही क्यों न निकल जाएँ | प्रभु ! मेरी सहायता करो जिससे मैं ज्ञान
चक्षुओं द्वारा तुम्हारे निराकार रूप के दर्शन कर सकूँ | अगर व्याकुल होकर मैंने
आत्महत्या कर ली तो इसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी होगी | इसलिए अपने बच्चे की रक्षा
करो, भगवान् !”
वह तीन दिन की
समाधी लेना चाहती थी, परन्तु ऐसा करने का उसे अवसर ही नहीं मिलता था | एक दिन किसी
कार्यवश गंगाधर को पुणे जाना पड़ा | तभी उन्हें समाधिस्थ होने का अवसर मिल गया | वह
घंटों तक ध्यानावस्था में बैठी रहीं | उस समय वह विठोबा की मूर्ति के सामने बैठकर
ह्रदय में राम का ध्यान कर रही थी, उनके नेत्र बंद थे | ध्यानावस्था में उन्होंने
देखा की संत तुकारामजी उन्हें कवित्व शक्ति प्रदान कर रहे हैं और कह रहें हैं “बहिणा ! यह तेरा
तेरहवाँ और अंतिम जन्म है | तूने अपनी सभी इच्छाओं को पूरा कर लिया है | यही नहीं
अपने पिछले जन्म के कर्मों का प्रतिफल भी भुगत लिया है | अब जिस पुत्र को तू जन्म
देगी, वह पिछले जन्म में तेरा साथी ही था” | उन्हें संत
तुकारामजी के दिव्य स्पर्श का स्पष्ट आभास हुआ और उनकी सभी इन्द्रियाँ शांत एवं
निश्चल हो गई | उस समय उन्हें ईश्वरीय अनुभूति हुई | उन दिव्य अनुभूतियों में आरूढ़
होकर उनकी अन्तरात्मा दिव्य आनंद से नाचने लगी | ऐसी ही स्थिति में उन्होंने
इंद्रायणी नदी में स्नान किया और मंदिर में जाकर विठोबा की मूर्ति का पूजन किया | तब
उन्होंने पांच कविताओं की रचना करके भगवान् विट्ठल के चरणों में अर्पित कीं | काव्य
की दृष्टि से ये उनकी सर्वप्रथम रचनाएँ थीं |
तदनन्तर बहिणा
का परिवार देहु छोड़कर शिउर में बस गया | इस बीच बहिणा ने मौन व्रत धारण किया | वह
अध्यात्मिक चिंतन में ही इतनी मस्त रहती थीं की संसार की बातों की तरफ ध्यान देने
की उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती थी | शिउर जाने के पश्चात उनके जीवन में कोई
उल्लेखनीय घटना नहीं घटी, उनका जीवन शांतिपूर्वक चलता रहा | उनके माता-पिता और पति
की मृत्यु कब हुई इस बात का कहीं कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है | सन-१६४९ में उनके
गुरुदेव संत तुकारामजी सशरीर वैकुण्ठ धाम को पधार गए | बहिणा को जब अपने गुरुदेव
का यह समाचार प्राप्त हुआ तो उन्हें बहुत दुःख हुआ | वह देहु आई और उन्होंने १८ दिन
तक उपवास किया | अंततः उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उनके गुरुदेव संत तुकारामजी ने
उन्हें दर्शन देकर आशिर्वाद प्रदान किया |
महाराष्ट्र उन दिनों अध्यात्मिक एवं राजनैतिक
दृष्टि से उन्नति के शिखर पर था | छत्रपति शिवाजी की ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी
सर्वत्र फ़ैल रही थी | विशाल महाराष्ट्र में साम्राज्य स्थापित करने हेतु उन्हें
समर्थ रामदासजी एवं संत तुकारामजी जैसे महान संतों का सहयोग प्राप्त हो रहा था |
अपने गुरुदेव के जाने के बाद बहिणा ने किसी उच्च कोटि के संत महापुरुष के सहयोग की
आवश्यकता का अनुभव किया | अतः उन्होंने समर्थ रामदासजी को गुरुतुल्य आदर प्रदान
किया | किन्तु सन-१६८१ में वे भी इस नश्वर चोले का त्याग कर गए | अतः बहिणा दू:खी
होकर शिउर लौट आई | इसके बाद का उनका जीवन अज्ञात है |
बहिणाबाई को ७२ वर्ष की आयु में लगने लगा कि
अब उनका शरीर त्यागने का समय निकट आ गया है | उनकी पुत्रवधू रुक्मिणी की मृत्यु हो
गई थी | उनका बेटा विठोबा गोदावरी के तट पर स्थित शुक्लेश्वर में जब अपनी पत्नी का
अंतिम संस्कार कर रहा था तो उसे अपनी माँ का पत्र मिला जिसमें लिखा था “तुम शीघ्रातिशीघ्र लौट आओ, क्योंकि आज से पांच दिन बाद मेरे
इस शरीर का अपेक्षित अंत आ जायेगा | किन्तु तुम्हारे आने तक मैं इसे आत्मसंयम
द्वारा रोक लूंगी|” पत्र पाते ही विठोबा ने गोदावरी के तट पर बहिणा की समाधी के
लिए स्थान चुना तथा शीघ्रता से घर लौटा |
उसने घर आकर माँ
को बताया की स्वप्न में उस भी माँ की मृत्यु का संकेत मिल गया था और ज्यों ही उसे
पत्र मिला वह शीघ्र घर लौट आया | बहिणा ने विठोबा से कहा “सुनो मेरे बेटे !
हम दोनों ने पिछले बारह जन्मों तक अनेक धार्मिक कार्य मिलकर किये हैं | तेरहवें
जन्म में तुम मेरे बेटे बने हो | यह मेरा अंतिम जन्म है, क्योंकि सभी वासनाएं जो
जन्म और मृत्यु का कारण होती हैं उनका मैंने अंत कर दिया है” | अंतिम समय में
अपनी माँ के द्वारा ये वचन सुनकर विठोबा को आश्चर्य हुआ | वह पूरी होश में थीं अतः
विठोबा के लिए शंका की कोई गुंजाईश नहीं थी, क्योंकि उसकी माँ ने उससे जीवन में
कभी झूठ नहीं बोला था | फिर भी उसने कहा “माँ ! मुझे तनिक शंका है !”
“क्या है बेटे ?
बोलो !”
“माँ ! तुमने मेरे
पूर्व जन्मों का उल्लेख किया, पर क्या तुम उनके बारे में सविस्तार कुछ जानती हो ?”
“हाँ बेटे ! क्यों
नहीं | यद्यपि मैं किसी को भी यह नहीं बताना चाहती थी, पर तुम्हारी इच्छा है, अतः
बताती हूँ |” इतना कहकर बहिणा ने अपने बारह जन्म पूर्व की कहानी बतलाई
और तेरहवें और अंतिम जन्म को कैसे प्राप्त हुई यह भी बतलाया |
मृत्यु का समय
जैसे ही निकट आया बहिणा ने अपने पुत्र से कहा कि ब्राह्मण को बुलवाकर वेद मंत्रों
का पाठ करवाए | उन्हें अब अलौकिक नाद सुनाई दे रहा था | मृत्यु के समय होने वाली
स्थिति का उन्होंने बड़ा ही विस्तृत वर्णन किया और अपने दाह संस्कार आदि के बारे
में आदेश दिया |
अपने तेरहवें
जन्म में मोक्ष के लिए कठिन साधना कर सन-१७०० में, बहत्तर वर्ष की आयु में यह भक्त
महिला शांतिपूर्वक स्वर्ग सिधारीं |
बहिणाबाई साधारण
कोटि की कवियित्री नहीं थीं | उनकी आत्मकथा कविता में है | अपने गुरु संत
तुकारामजी के समान ही उनकी शैली भी बड़ी स्पष्ट किन्तु सारगर्भित थी | संत
तुकारामजी के समान इन्होंने भी “अभंग” छन्द का प्रयोग किया था | सहज सुलभ धारा-प्रवाह पद्य, उनकी
श्रेष्ठ कविताओं का परिचायक है | आत्मज्ञान, जीवन, धर्म, सद्गुरु, संतवृत्ति,
ब्राह्मणत्व, भक्ति आदि उनकी कविता के विषय थे | उनके काव्य में घरेलु एवं
चारित्रिक शिक्षाओं का समावेश भी है जिससे सामान्य पाठक बड़ी प्रेरणा प्राप्त करते
हैं | अध्यात्मिक चिंतन के लिए अत्यधिक लगाव और सांसारिक पदार्थों के प्रति
उपेक्षा के कारण उनके पारिवारिक जीवन के बारे में बड़े अनोखे विचार हैं | पत्नी के
कर्तव्यों पर तो उनके विचार उल्लेखनीय हैं | इन्हीं विचारों के द्वारा तीन सौ वर्ष
पूर्व की भारतीय नारी की उच्च आदर्श का सजीव चित्रण प्राप्त होता है | वे कहती हैं
कि “एक कर्त्तव्यपरायण पत्नी अपने पति और धर्म दोनों के प्रति
समान रूप से जागरूक रहती है | ऐसी पत्नी तो स्वर्ग को अपनी मुट्ठी में रखती है | कर्त्तव्यपरायण
पत्नी वाही है जिसके मन में क्रोध और घृणा का कोई स्थान नहीं है, जिसको ज्ञान का
घमण्ड नहीं है, जो कुकृत्यों से बचती है और आज्ञाकारिणी है, जिसने काम-वासनाओं पर
नियंत्रण कर लिया है, जो साधुओं की सेवा के लिए सदैव तैयार रहती है और बिना किसी
आनाकानी किये पति की आज्ञा पालती है | ऐसी पत्नी अपने सांसारिक जीवन पर विजय
प्राप्त कर स्वर्गधाम जाती है | पत्नी का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने पति की इच्छा
को पूर्ण सद्भावना से स्वीकार कर अपनी गृहस्थी को सुखमय बनाए | ऐसा करने में चाहे
उसकी मृत्यु ही क्यों न हो जाय, परन्तु उसे इन बातों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए |
ऐसी स्त्री, उसकी जाति और उसका परिवार धन्य है |”
बीसवीं शताब्दी
की महिलाएं जो स्वतन्त्रता और समानता के लिए पुरुषों से झगड़ रही हैं, इस प्रकार के
विचार सुनकर मुँह बिचकाएँगी, किन्तु बहिणाबाई ने यह सब, वेदान्त से प्रभावित होकर
तात्कालिक समाज के अनुरूप चरित्र निर्माण और जन-सेवा की भावनाओं की शिक्षा देने की
दृष्टि से कहा था | इसलिए उनका जीवन चरित्र जहाँ हमें एक ओर धार्मिक सिद्धांतों की
शिक्षा देता है तो दूसरी ओर जीवन को सुखमय बनाने का मार्ग भी सुझाता है |
ॐ ॐ ॐ ॐ
भक्त बहिणाबाई
महाराष्ट्र में तीन शताब्दी पूर्व सन-१६२८
में स्त्री संत बहिणाबाई का उज्जवल जीवन चरित्र प्रकाश में आया | सुप्रसिद्ध
एल्लोरा की गुफाओं वाले क्षेत्र में वेरुल के निकट देवगांव है | वहाँ से इस जीवन
कथा का आरम्भ हुआ |
यह स्थान प्राचीन काल से देवताओं की नगरी
कहलाता है | शिव नदी पास ही निरंतर बहती है | तीर्थ स्नान के लिए यह स्थान अन्य
पवित्र तीर्थ स्थानों के सामान ही पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण माना गया है | इसी कारण
इसे लक्ष तीर्थ के नाम से जाना जाता है | महर्षि अगस्त्य ने वरदान दिया था कि इस
तीर्थ पर जो भी भक्तगण आकर स्नान, पूजन व प्रार्थना करेंगे उन्हें मनोवांछित फल
प्राप्त होगा |
इसी पवित्र देवगांव में आउजी कुलकर्णी नामक
एक ब्राह्मण रहते थे | वह सीधे सरल एवं भाग्यशाली व्यक्ति थे | उनकी पत्नी
जानकीबाई एक श्रेष्ठ गृहिणी थी | इनकी कोई संतान नहीं थी | इसी कारण इस दम्पत्ति
ने लक्ष तीर्थ पर संतान प्राप्ति हेतू पूजन किया | इस तपस्या के फलस्वरूप आउजी को
तीन स्वप्न में दिखाई दिया कि एक पूज्य ब्राह्मण उन्हें दो पुत्र एवं एक पुत्री का
आशिर्वाद दे रहे हैं | एक साल में ही अर्थात सन-१६२८ में उनके घर एक कन्यारत्न ने
जन्म लिया और उसus कन्या का नाम ‘बहिणा’ रखा गया |
हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार कुल-पुरोहित
विश्वेश्वर ने कन्या की जन्म कुण्डली बनाई और भविष्यवाणी की, कि वह बहुत भाग्यशाली
होगी |
समय के साथ बहिणा अब चार वर्ष की हो चुकी थी
कि उसकी सगाई गंगाधर पाठक नामक ३० वर्षीय व्यक्ति से कर दी गई जो कुलकर्णी परिवार
से सम्बंधित थे | गंगाधर पाठक शिवपुर में रहते थे | वह चार वर्ष तो शांतिपूर्वक
बीत गए, किन्तु कालान्तर में बहिणा के पिता पारिवारिक संपत्ति के झगड़े में फंस गए,
जिसके फलस्वरूप परिवार को गरीबी तथा पारिवारिक कलह के कुपरिणाम भुगतने पड़े |
गंगाधर उनकी सहायता के लिए आए | अंत में सोच विचारकर यही निष्कर्ष निकाला गया कि
बहिणा के परिवार के लिए गाँव छोड़कर अन्यत्र चले जाने के अतिरिक्त और कोई दूसरा
मार्ग नहीं है | अतः एक दिन रात के समय गंगाधर पाठक सहित आउजी परिवार ने देवगांव
छोड़ दिया | गाँव छोड़ देने के बाद उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, यहाँ तक
कि भिक्षा भी मांगनी पड़ी | कहा भी गया है की सच्चाई के मार्ग पर चलनेवालों को बहुत
कष्ट झेलने पड़ते हैं | अपनी इस यात्रा में इस परिवार ने कई तीर्थ स्थानों के दर्शन
किये और पवित्र नदियों में स्नान किया | तीर्थ स्थानों के दर्शन से बहिणाबाई को
बड़ा हर्ष होता था | पंढरपुर जो महाराष्ट्र की वाराणसी कहलाता है, में वे पांच दिन
ठहरे | भगवान पांडुरंग की प्रतिमा को देख कर बहिणा को अपार आनंद मिला | इसके
उपरान्त वे भगवान शिव की चरण राज से पवित्र हुए महादेव वन को गए | ब्राह्मण होने
के नाते ये लोग भिक्षा में केवल बिना पकाया हुआ अन्न ही लेते थे | इस प्रकार चलते
चलते वे रहिमतपुर में बसने के लिए विवश हुए | सौभाग्य से गाँव का पुजारी वाराणसी
गया हुआ था, अतः गंगाधर को पुजारी का काम सौंपा गया |
समय के साथ साथ बहिणा ग्यारह वर्ष की हो गई
थी | उसे साधू सन्यासियों के सत्संग सुनना तथा उनकी संगती ही अधिक रुचिकर लगती थी
| पड़ोस की लडकियां जब उसके साथ खेलने के लिए आतीं तो देखती कि वह प्रभु के चिंतन
में लीन है | लगता था पूर्व जन्म में इश्वर प्राप्ति के यत्न से अतृप्त बहिणा अपने
इस जीवन को इश्वर के ध्यान में बिताना चाहती थी (इश्वर प्राप्ति के अधूरे लक्ष्य
को बहिणा इस जन्म पूरी तरह इश्वर में डूबकर पूरा करना चाहती थी) | इश्वर प्राप्ति
की इच्छा ही उसका सबसे बड़ा खेल था |
गाँव के पुरोहित के वाराणसी से लौटने पर
गंगाधर को पुजारी के काम से निवृत्त कर दिया गया | आय का अब अन्य कोई साधन न होने
के कारण यह परिवार सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थान कोल्हापुर चला गया | यहीं के बहिणा के
जीवन का मुख्य अध्याय शुरू होता है|
कोल्हापुर में ब्रह्मभट्ट नामक एक ब्राह्मण
रहते थे जो वेद और शास्त्रों के ज्ञाता थे | उन्होंने दया करके आउजी परिवार को
आश्रय प्रदान किया | ब्रह्मभट्ट के घर में रहने के कारण आउजी परिवार को भी हरी
कीर्तन करने तथा पुराणों की कथा सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ | इसी नगर में जयराम
स्वामी भी रहा करते थे जो भागवत एवं पुराण आदि की कथाएं करते थे| उनसे पौराणिक
कथाएँ सुनकर बहिणा के ह्रदय में भगवद पूजन, ध्यान आदि की इच्छा अधिक बलवती होती गई
|
ब्रह्मभट्ट को किसी पर्व पर एक काले गहरे रंग
की गाय दान में मिली | उसके सींग मुलम्मा से मढ़े हुए थे, खुरों पर चांदी मढ़ी हुई
थी | उसकी पीठ पर पीली रेशमी झूल पड़ी हुई थी|
उस समय के दान की परम्परा के
अनुसार यह विशिष्ट प्रकार की भेंट थी | इस गाय ने एक काला बछड़ा भी दिया | बछड़े के
जन्म के दस दिन बाद ब्रह्मभट्ट के मन में यह विचार आया कि वह यह गाय गंगाधर को दान
कर दे | अतः उसने गाय दान का दी | गाय को पाकर ब्राह्मण परिवार बड़ा प्रसन्न हुआ | बछड़े
को बहिणा से बड़ा प्रेम हो गया | वह जहाँ भी जाती बछड़ा उसके साथ जाता | उसी के
हाथों से चारा पानी खाता पीता था और जब वह जल भरने जाती तब भी उसके साथ ही जाता | बछड़े
की प्रत्येक बात बहिणा उसी प्रकार समझ जाती थी जिस प्रकार कोई बच्चा अपने पालतू
पशु की भाषा समझ जाता है | बहिणा को पता चल गया कि बछड़े को कीर्तन के प्रति
श्रद्धा है, क्योंकि जब कभी वह कीर्तन में जाती तो बछड़ा उसके साथ जाता था | वह
सत्संग में भी बहुत सावधानी से बैठा रहता, किसी को भी बछड़े के कारण कष्ट नहीं होता
था | विचार करने के उपरान्त बहिणा एवं अन्य भक्तजनों ने यह मान लिया कि बछड़े में
किसी योग भ्रष्ट व्यक्ति की आत्मा है |
कोल्हापुर में जयराम स्वामी का कीर्तन बहुत
जनप्रिय हो गया था | बहिणा कीर्तन में भाग लेती थी | वह और उसका बछड़ा नगर में
चर्चा का विषय बन गए थे | यद्यपि उसका पति भक्तिभाव वाला था किन्तु उसका स्वभाव
जाता तेज था | उसकी पत्नी समाज में चर्चा का विषय बने यह बात उसे स्वीकार नहीं थी
| एक दिन ऐसी ही चर्चा सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया | वह दौड़ता हुआ घर गया और बहिणा के
बाल पकड़कर उसे बहुत मारा | गाय और उसका बछड़ा भी रंभाने लगे | पति के इस व्यव्हार
से बहिणा को बड़ा दुःख हुआ | बहिणा जो केवल ग्यारह वर्ष की बालिका थी अपने ३७
वर्षीय पति का विरोध करती भी कैसे | वह सोचने लगी की आखिर उसने ऐसी कौनसी गलती की
है | उसके माता पिता भी उसके पति को शांत करने में असमर्थ रहे, उन्होंने उससे
क्रोध का कारण जानना चाहा | तब उसके ईर्ष्यालु पति ने क्रोधित होकर उत्तर दिया “जयराम स्वामी में
क्या विशेषता है ? हरि कीर्तन की इतनी अधिक चिन्ता कौन करता है ? अगर उसने दुबारा
कीर्तन में जाने के लिए कदम उठाया तो मैं उसे फिर पिटूँगा” | तब से वह अक्सर
बहिणा को मारा पीटा करता था |
ब्रह्मभट्ट जो
परिवार का मुखिया था, उससे गंगाधर का यह व्यव्हार सहन नहीं हुआ | उसने एक दिन
गंगाधर से घर छोड़कर तत्काल चले जाने को कहा | परिणाम स्वरुप कुछ दिन तक घर में
शांति बनी रही | अचानक गाय का बछड़ा बहुत बीमार हो गया | हर तरह से चिकित्सा करने
पर भी उसे बचाने के प्रयास निष्फल रहे | उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे | बहिणा को उससे
अधिक प्रेम था, अतः वह उसके अंतिम शब्दों को समझ रही थी | उसे लगा मानों बछड़ा
इश्वर से प्रार्थना कर रहा है | दूसरे दिन बछड़े ने अपने प्राण त्याग दिए | बहिणा के
ह्रदय पर इस घटना का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा | वह तीन दिन तक बेहोश पड़ी रही | चौथे
दिन उसे ऐसा आभास हुआ मानो एक ब्राह्मण उसे जगाकर कर रहा है “बहिणा उठो ! विचार
करना आरम्भ करो ! तुम्हारे में ज्ञानोदय होना चाहिए !”
बहिणा ने जब
आँखे खोलीं तो देखा दीपक जल रहा है, अर्ध रात्रि के समय में उसके माता-पिता, भाई
और पति घबराये हुए उसके पास बैठे हैं | स्वप्न में बहिणा ने जिस ब्राह्मण को देखा
था वह पंढरपुर के पांडुरंग के प्रतिबिम्ब के सामान था | तदुपरान्त बहिणा की स्मृति
में केवल देवताओं और संतों की प्रतिमाएँ, उनकी कहानियाँ
और पद ही शेष रह गए थे | उसका मन महाराष्ट्र के प्रसिद्द संत तुकाराम के दर्शनों
के लालायित हो उठा | उसने यह घोषणा कर दी कि तुकाराम ही मेरे गुरु हैं | उनसे
दीक्षा पाए बिना वह जल बिन मछ्लेगी की तरह तड़पती रहेगी |
उसने तुकारामजी के बारे में सुना था कि किसी
ब्राह्मण की इच्छा रखने के लिए उन्होंने अपनी काव्य पुस्तक की पाण्डुलिपि गहरे जल
में बहा दी थी और तेरह दिन बाद जब वही पाण्डुलिपि निकाली गई तो वह ज्यों की त्यों
प्राप्त हुई | अपने समय के विभिन्न विचारकों एवं सत्पुरुषों में केवल उन्होंने ही
मराठी भाषा में जन साधारण के लिए वेदान्त का सार प्रस्तुत किया | अपने गुरु का
स्मरण करके बहिणा फिर अचेत हो
गई | बछड़े की मृत्यु के १७ दिन, बहिणा ने संत तुकारामजी के दर्शन स्वप्नास्वथा में
किये | संत ने बहिणा को धैर्य दिलाते हुए “राम कृष्ण हरी” का मंत्र दिया |
अध्यात्मिक
ज्ञान की प्राप्ति हेतु संत तुकारामजी ने बहिणाबाई का मार्गदर्शन किया | बहिणा की
अचेतावस्था में एक दिन जयराम स्वामी उसे देखने आए | बहिणा की शैय्या के समीप बैठे
बैठे जयराम स्वामी कुछ देर के लिए समाधिस्थ हो गए | अचानक बहिणा ने अनुभव किया कि
संत तुकारामजी उससे कह रहे हैं “मैं स्वामी जयराम से मिलने आया हूँ | यहाँ मैंने तुम्हें
देखा| मुक्ति
के लिए तुम्हारी उत्कट इच्छा की मैं प्रशंसा करता हूँ | अब यहाँ मत रुको |
आत्म-ज्ञान और आत्म अनुभूति के लिए यत्न करो |” इस प्रकार अनेक बार बहिणा को संत की छवि दिखाई दी, किन्तु
अधिकांश लोग इसे बहिणा का पागलपन
ही समझते थे | लोग झुंड बनाकर आते और उसके बारे पूछते | कुछ बहिणा के सात्विक जीवन
की प्रशंसा भी करते | गंगाधर जैसे ईर्ष्यालु स्वाभाव के व्यक्ति को अपनी पत्नी के
बारे में उत्सुक जन समूह का घर में इस तरह आना-जाना बिलकुल पसंद नहीं था | उसे यह
भी पसंद नहीं था कि उसके जैसे कर्मकाण्डी ब्राह्मण की पत्नी का गुरु तुकाराम जैसा
शूद्र व्यक्ति हो | उसे यह लगने लगा की तुकाराम ने उसकी पारिवारिक जीवन जड़ें हिला
दी है| अपनी पत्नी की लोकप्रियता और पत्नी के सामने अपनी उपेक्षा उससे सहन नहीं
होती थी | पति का सहज स्वाभिमान पत्नी की ख्याति के आगे झुकने को तैयार न था | ऐसे
घर में जहाँ उसका प्रभाव दिन प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा था, वहां ठहरना उसके लिए असंभव
हो गया था |
एक दिन बड़े
विनम्र भाव से उसने श्वसुर से कहा “आपकी पुत्री यानी मेरी पत्नी यद्यपि अब गर्भवती है फिर भी
मैंने उसे आपके पास छोड़ देने का निश्चय कर लिया है | मैं अब तीर्थ यात्रा के लिए
जाऊँगा | इसका कारण है पत्नी की इश्वर प्राप्ति की प्रबल इच्छा तथा तुकाराम गुरु
के प्रति अनावश्यक श्रद्धा | मैं अब नहीं लौटूंगा | मैं अब उसका मुँह नहीं देखूंगा
| अपनी ही पत्नी द्वारा अपना अपना सहने के लिए कौन तैयार होगा !”
विदाई के दिन
अचानक गंगाधर बीमार हो गया | वह सात दिन तक तेज बुखार में पड़ा रहा | उसने न भोजन
ग्रहण किया और न दवा ही | बहिणा रात-दिन उसकी सेवा करती रहती| गंगाधर को बहुत कष्ट
हो रहा था | उसे बड़ा पश्चाताप होने लगा | उसे लगने लगा की यह शारीरिक कष्ट उसे
भगवान पांडुरंग एवं उनके भक्त तुकाराम के अपमान के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ है | ऐसी
स्थिति में संभवतः उसकी आत्मा ही कह रही थी “तू क्यों मर रहा
है ? अगर तू जीवित रहना चाहता है तो अपनी पत्नी को अंगीकार कर ले | उसने तेरा क्या
बिगाड़ा है ? वह तो सच्ची इश्वर भक्त है | तुम्हें भी उसके साथ मिलकर इश्वर भक्ति
में जुट जाना चाहिए |” यह सन्देश उसने बहिणा की उपस्थिति में ही सुना | इसके बाद
ही गंगाधर स्वस्थ होने लगा, यह देखकर बहिणा को बड़ा आश्चर्य हुआ | गंगाधर को लगा कि
उसका पुनर्जन्म हुआ है और वह हरी की भक्ति में लग गया | उसने अपने श्वसुर से कहा
कि वे देवगांव लौट जाएँ तथा उसे और उसकी पत्नी को वन में तपस्या करने की आज्ञा दें
|
इस घटना के
उपरांत इस ब्राह्मण परिवार ने पुणे के निकट देहु नामक तीर्थ स्थान पर जाकर संत
तुकारामजी के दर्शन करने की ठानी | उनकी गाय भी उनके साथ गई | इंद्रायणी में स्नान
करने के पश्चात उन्होंने संत तुकारामजी के दर्शन किये | usउस समय संत तुकारामजी
मंदिर में बैठे पूजा कर रहे थे | बहिणा को संत तुकारामजी के दर्शन करके, जिन्हें
उसने कोल्हापुर में अपनी ध्यानावस्था में देखा था अपार शांति और आनंद प्राप्त हुआ |
दर्शन करते ही उसमें भावनात्मक परिवर्तन हुआ | द्वैत की भावना मिट गई | उसकी
बुद्धि स्थिर हो गई और ह्रदय निष्काम हो गया | usउस अनुभूति का वर्णन करते हुए
बहिणा ने कहा “संत तुकारामजी के दर्शन पाते ही मेरा अहं और सांसारिक
व्याधियों का बोझ नष्ट हो गया |”
देहु में उनके
लिए कोंडाजी नामक ब्राह्मण द्वारा भोजन की व्यवस्था तो हो गई परन्तु आवास की
व्यवस्था न हो सकी | माम्बाजी स्वामी से, जो पड़ोस में ही रहते थे और बहुत बड़े मकान
के स्वामी थे, गंगाधर ने स्थान देने की प्रार्थना की | उन्होंने गंगाधर को डंडे
मारकर निकाल दिया | तब वे मंदिर में यात्रियों के ठहरने के स्थान में ही रहने लगे
| वहाँ वे बहुत शांतिपूर्वक रहते और संत तुकारामजी का हरि कीर्तन सुनते |
माम्बाजी स्वामी
क्रोधी, ईर्ष्यालु और अहंकारी स्वाभाव के व्यक्ति थे | वह अपने को देहु का प्रमुख
नागरिक समझते थे | तुकारामजी से, जो किसी भी विद्या के ज्ञाता होने का दंभ नहीं
करते थे, बहुत लोग मिलने आते थे | माम्बाजी को यह सब देखकर जलन होती थी | उसने
गंगाधर और उसकी पत्नी से अनुरोध किया कि वे उसके शिष्य बन जाएँ | उन्होंने उत्तर
दिया कि हम संत तुकारामजी को अपना गुरु मानते हैं | यह सुनकर माम्बाजी ने उनकी
भर्त्सना करते हुए कहा कि “अरे ! तुम ब्राह्मण होकर भला शुद्र तुकाराम को अपना गुरु
कैसे मानते हो ? क्या अब शुद्र को भी ब्रह्म-ज्ञान पाने का अधिकार प्राप्त हो गया
है ? याद रखो इसके कारण तुम्हारा जाती बहिष्कार किया जायेगा |” तत्पश्चात वह इस परिवार का विरोधी हो गया और हर समय गंगाधर
तथा उसकी पत्नी को बुरा भला कहने लगा | बहिणा ने इससे प्रेरित होकर कहा था “ परीक्षा की
दृष्टि से प्रभु हमें कई प्रकार से कष्ट भोगने पर विवश करता है” | बहिना का कथन
यथार्थ ही है | संतों और महापुरुषों को बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता
है | संत तुकारामजी को भी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा था |
संत तुकारामजी
की बढती हुई ख्याति को देखकर माम्बाजी ने पुणे के अप्पाजी स्वामी को पत्र लिखकर
सूचित किया कि “तुकाराम जैसे शूद्र की इतनी हिम्मत बढ़ गई है कि वह मंदिर
में कीर्तन करता है | मंदिर में ही रहनेवाला ब्राह्मण परिवार उसको पूज्य मानता है” | पत्र में
माम्बाजी ने बहिणाबाई तथा गंगाधर के नाम का उल्लेख किया और अप्पाजी स्वामी से
अनुरोध किया कि वे तुकाराम के लिए दण्ड की व्यवस्था करें |
ब्राह्मण का गुरु
एक शुद्र व्यक्ति हो, यह बात uउस समय में किसी भी व्यक्ति को सहज स्वीकार हो यह
संभव नहीं था, क्योंकि usउस समय ब्राह्मणों का समाज में अधिक वर्चस्व था | अतः
अप्पाजी स्वामी का ऐसा समाचार पाकर क्रोधित होना स्वाभाविक था | उन्होंने ब्राह्मण
परिवार को जाति से बाहर करने की घोषणा कर दी | अप्पाजी स्वामी का निर्णय सुनकर
माम्बाजी ने बहिणा के परिवार को वह स्थान छोड़कर अन्यत्र चले जाने की आज्ञा दी |
बहिणा के परिवार
की गाय उनके साथ ही थी | एक दिन माम्बाजी ने उन्हें परेशान करने की दृष्टि से गाय
चुरा ली | उसने उस गाय को बड़ी निर्दयता से बांधकर अपने घर के किसी कोने में छिपा
दिया | गाय को तीन दिन तक भूखा और प्यासा रखा गया | इतना ही नहीं वह बंधी हुई गाय
को बहुत पीटता भी था | बहिणा गाय के लिए अधीर हो गई | गंगाधर ने गाय की खोज करने
के लिए कोई भी कसर बाकी नहीं रखी | इधर संत तुकारामजी को स्वप्न में बहिणा की गाय
दिखाई दी जो छुटकारा पाने के लिए उनसे याचना कर रही थी | जब भी गाय को मार पड़ती,
आत्मिक एकरूपता के कारण तुकारामजी के शरीर पर सुजन आ जाती |
एक दिन अचानक
माम्बाजी के घर आग लग गई | गाँव के लोग सहायता के लिए दौड़े और आग बुझा दी गई | जो
लोग वहां सहायता के लिए गए थे उन्होंने वहां विपत्ति में पड़ी गाय के रम्भाने की
आवाज़ सुनी | गाय को जलने से तो बचा लिया गया, परन्तु जब लोगों ने यह देखा की मार
पड़ने के कारण गाय की पीठ पर जैसे निशान पड़े थे, वैसे ही निशान संत तुकारामजी के
शरीर पर भी हैं तो सबको ही बड़ा आश्चर्य हुआ | तब लोगों की संत तुकारामजी के प्रति
श्रद्धा और भी अधिक बढ़ गई और वे लोग उन्हें भगवान पांडुरंग के समान ही पूजनीय
मानने लगे |
तत्पश्चात बहिणा
ने एक कन्यारत्न को जन्म दिया जिसका नाम काशीबाई रखा गया | बहिणा को ऐसा आभास हुआ
कि काले बछड़े ने ही कन्या के रूप में उसकी कोख से जन्म लिया है| स्वभावतः हर माँ
बच्चे के जन्म पर प्रसन्न होती है, परन्तु बहिणा अपने स्वाभाव के अनुसार उदासीन ही
बनी रही | उनके मन में बहुत बार यह विचार आता कि स्त्री होने के नाते वह सांसारिक
घर गृहस्थी के झंझटों से छूट नहीं पा रही हैं और यही उनकी अध्यात्मिक उन्नति में
सबसे बड़ा अवरोध है | उनके आसपास ऐसे सम्बन्धियों और साथियों का घेरा है जो अध्यात्मिक
ज्ञान प्राप्ति के लिए की जानेवाली तपस्या के विरोधी हैं | उनके पति यद्यपि
वेदान्ती हैं तथापि उनमें इश्वर प्राप्ति की सच्ची लगन नहीं है | usउस विरोधी
वातावरण से उन्हें असह्य वेदना होती जिसके कारण उन्हें बहुत बार आत्महत्या करने का
विचार आता | उनकी आत्मा देह के बंधन के मुक्त होने के लिए तड़प रही थी | उनके मन
में आता कि नदी के गहरे पानी में जाकर डूब जाय या चिता में जलकर भस्म हो जाय | एक
दिन ऐसी ही असह्य वेदना से दु:खी होकर उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की कि “हे प्रभु ! तुम
मुझे पति के माध्यम से चिढ़ा रहे हो किन्तु मैं तुम्हारी भक्ति नहीं छोडूंगी, चाहे
मेरे प्राण ही क्यों न निकल जाएँ | प्रभु ! मेरी सहायता करो जिससे मैं ज्ञान
चक्षुओं द्वारा तुम्हारे निराकार रूप के दर्शन कर सकूँ | अगर व्याकुल होकर मैंने
आत्महत्या कर ली तो इसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी होगी | इसलिए अपने बच्चे की रक्षा
करो, भगवान् !”
वह तीन दिन की
समाधी लेना चाहती थी, परन्तु ऐसा करने का उसे अवसर ही नहीं मिलता था | एक दिन किसी
कार्यवश गंगाधर को पुणे जाना पड़ा | तभी उन्हें समाधिस्थ होने का अवसर मिल गया | वह
घंटों तक ध्यानावस्था में बैठी रहीं | उस समय वह विठोबा की मूर्ति के सामने बैठकर
ह्रदय में राम का ध्यान कर रही थी, उनके नेत्र बंद थे | ध्यानावस्था में उन्होंने
देखा की संत तुकारामजी उन्हें कवित्व शक्ति प्रदान कर रहे हैं और कह रहें हैं “बहिणा ! यह तेरा
तेरहवाँ और अंतिम जन्म है | तूने अपनी सभी इच्छाओं को पूरा कर लिया है | यही नहीं
अपने पिछले जन्म के कर्मों का प्रतिफल भी भुगत लिया है | अब जिस पुत्र को तू जन्म
देगी, वह पिछले जन्म में तेरा साथी ही था” | उन्हें संत
तुकारामजी के दिव्य स्पर्श का स्पष्ट आभास हुआ और उनकी सभी इन्द्रियाँ शांत एवं
निश्चल हो गई | उस समय उन्हें ईश्वरीय अनुभूति हुई | उन दिव्य अनुभूतियों में आरूढ़
होकर उनकी अन्तरात्मा दिव्य आनंद से नाचने लगी | ऐसी ही स्थिति में उन्होंने
इंद्रायणी नदी में स्नान किया और मंदिर में जाकर विठोबा की मूर्ति का पूजन किया | तब
उन्होंने पांच कविताओं की रचना करके भगवान् विट्ठल के चरणों में अर्पित कीं | काव्य
की दृष्टि से ये उनकी सर्वप्रथम रचनाएँ थीं |
तदनन्तर बहिणा
का परिवार देहु छोड़कर शिउर में बस गया | इस बीच बहिणा ने मौन व्रत धारण किया | वह
अध्यात्मिक चिंतन में ही इतनी मस्त रहती थीं की संसार की बातों की तरफ ध्यान देने
की उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती थी | शिउर जाने के पश्चात उनके जीवन में कोई
उल्लेखनीय घटना नहीं घटी, उनका जीवन शांतिपूर्वक चलता रहा | उनके माता-पिता और पति
की मृत्यु कब हुई इस बात का कहीं कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है | सन-१६४९ में उनके
गुरुदेव संत तुकारामजी सशरीर वैकुण्ठ धाम को पधार गए | बहिणा को जब अपने गुरुदेव
का यह समाचार प्राप्त हुआ तो उन्हें बहुत दुःख हुआ | वह देहु आई और उन्होंने १८ दिन
तक उपवास किया | अंततः उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उनके गुरुदेव संत तुकारामजी ने
उन्हें दर्शन देकर आशिर्वाद प्रदान किया |
महाराष्ट्र उन दिनों अध्यात्मिक एवं राजनैतिक
दृष्टि से उन्नति के शिखर पर था | छत्रपति शिवाजी की ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी
सर्वत्र फ़ैल रही थी | विशाल महाराष्ट्र में साम्राज्य स्थापित करने हेतु उन्हें
समर्थ रामदासजी एवं संत तुकारामजी जैसे महान संतों का सहयोग प्राप्त हो रहा था |
अपने गुरुदेव के जाने के बाद बहिणा ने किसी उच्च कोटि के संत महापुरुष के सहयोग की
आवश्यकता का अनुभव किया | अतः उन्होंने समर्थ रामदासजी को गुरुतुल्य आदर प्रदान
किया | किन्तु सन-१६८१ में वे भी इस नश्वर चोले का त्याग कर गए | अतः बहिणा दू:खी
होकर शिउर लौट आई | इसके बाद का उनका जीवन अज्ञात है |
बहिणाबाई को ७२ वर्ष की आयु में लगने लगा कि
अब उनका शरीर त्यागने का समय निकट आ गया है | उनकी पुत्रवधू रुक्मिणी की मृत्यु हो
गई थी | उनका बेटा विठोबा गोदावरी के तट पर स्थित शुक्लेश्वर में जब अपनी पत्नी का
अंतिम संस्कार कर रहा था तो उसे अपनी माँ का पत्र मिला जिसमें लिखा था “तुम शीघ्रातिशीघ्र लौट आओ, क्योंकि आज से पांच दिन बाद मेरे
इस शरीर का अपेक्षित अंत आ जायेगा | किन्तु तुम्हारे आने तक मैं इसे आत्मसंयम
द्वारा रोक लूंगी|” पत्र पाते ही विठोबा ने गोदावरी के तट पर बहिणा की समाधी के
लिए स्थान चुना तथा शीघ्रता से घर लौटा |
उसने घर आकर माँ
को बताया की स्वप्न में उस भी माँ की मृत्यु का संकेत मिल गया था और ज्यों ही उसे
पत्र मिला वह शीघ्र घर लौट आया | बहिणा ने विठोबा से कहा “सुनो मेरे बेटे !
हम दोनों ने पिछले बारह जन्मों तक अनेक धार्मिक कार्य मिलकर किये हैं | तेरहवें
जन्म में तुम मेरे बेटे बने हो | यह मेरा अंतिम जन्म है, क्योंकि सभी वासनाएं जो
जन्म और मृत्यु का कारण होती हैं उनका मैंने अंत कर दिया है” | अंतिम समय में
अपनी माँ के द्वारा ये वचन सुनकर विठोबा को आश्चर्य हुआ | वह पूरी होश में थीं अतः
विठोबा के लिए शंका की कोई गुंजाईश नहीं थी, क्योंकि उसकी माँ ने उससे जीवन में
कभी झूठ नहीं बोला था | फिर भी उसने कहा “माँ ! मुझे तनिक शंका है !”
“क्या है बेटे ?
बोलो !”
“माँ ! तुमने मेरे
पूर्व जन्मों का उल्लेख किया, पर क्या तुम उनके बारे में सविस्तार कुछ जानती हो ?”
“हाँ बेटे ! क्यों
नहीं | यद्यपि मैं किसी को भी यह नहीं बताना चाहती थी, पर तुम्हारी इच्छा है, अतः
बताती हूँ |” इतना कहकर बहिणा ने अपने बारह जन्म पूर्व की कहानी बतलाई
और तेरहवें और अंतिम जन्म को कैसे प्राप्त हुई यह भी बतलाया |
मृत्यु का समय
जैसे ही निकट आया बहिणा ने अपने पुत्र से कहा कि ब्राह्मण को बुलवाकर वेद मंत्रों
का पाठ करवाए | उन्हें अब अलौकिक नाद सुनाई दे रहा था | मृत्यु के समय होने वाली
स्थिति का उन्होंने बड़ा ही विस्तृत वर्णन किया और अपने दाह संस्कार आदि के बारे
में आदेश दिया |
अपने तेरहवें
जन्म में मोक्ष के लिए कठिन साधना कर सन-१७०० में, बहत्तर वर्ष की आयु में यह भक्त
महिला शांतिपूर्वक स्वर्ग सिधारीं |
बहिणाबाई साधारण
कोटि की कवियित्री नहीं थीं | उनकी आत्मकथा कविता में है | अपने गुरु संत
तुकारामजी के समान ही उनकी शैली भी बड़ी स्पष्ट किन्तु सारगर्भित थी | संत
तुकारामजी के समान इन्होंने भी “अभंग” छन्द का प्रयोग किया था | सहज सुलभ धारा-प्रवाह पद्य, उनकी
श्रेष्ठ कविताओं का परिचायक है | आत्मज्ञान, जीवन, धर्म, सद्गुरु, संतवृत्ति,
ब्राह्मणत्व, भक्ति आदि उनकी कविता के विषय थे | उनके काव्य में घरेलु एवं
चारित्रिक शिक्षाओं का समावेश भी है जिससे सामान्य पाठक बड़ी प्रेरणा प्राप्त करते
हैं | अध्यात्मिक चिंतन के लिए अत्यधिक लगाव और सांसारिक पदार्थों के प्रति
उपेक्षा के कारण उनके पारिवारिक जीवन के बारे में बड़े अनोखे विचार हैं | पत्नी के
कर्तव्यों पर तो उनके विचार उल्लेखनीय हैं | इन्हीं विचारों के द्वारा तीन सौ वर्ष
पूर्व की भारतीय नारी की उच्च आदर्श का सजीव चित्रण प्राप्त होता है | वे कहती हैं
कि “एक कर्त्तव्यपरायण पत्नी अपने पति और धर्म दोनों के प्रति
समान रूप से जागरूक रहती है | ऐसी पत्नी तो स्वर्ग को अपनी मुट्ठी में रखती है | कर्त्तव्यपरायण
पत्नी वाही है जिसके मन में क्रोध और घृणा का कोई स्थान नहीं है, जिसको ज्ञान का
घमण्ड नहीं है, जो कुकृत्यों से बचती है और आज्ञाकारिणी है, जिसने काम-वासनाओं पर
नियंत्रण कर लिया है, जो साधुओं की सेवा के लिए सदैव तैयार रहती है और बिना किसी
आनाकानी किये पति की आज्ञा पालती है | ऐसी पत्नी अपने सांसारिक जीवन पर विजय
प्राप्त कर स्वर्गधाम जाती है | पत्नी का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने पति की इच्छा
को पूर्ण सद्भावना से स्वीकार कर अपनी गृहस्थी को सुखमय बनाए | ऐसा करने में चाहे
उसकी मृत्यु ही क्यों न हो जाय, परन्तु उसे इन बातों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए |
ऐसी स्त्री, उसकी जाति और उसका परिवार धन्य है |”
बीसवीं शताब्दी
की महिलाएं जो स्वतन्त्रता और समानता के लिए पुरुषों से झगड़ रही हैं, इस प्रकार के
विचार सुनकर मुँह बिचकाएँगी, किन्तु बहिणाबाई ने यह सब, वेदान्त से प्रभावित होकर
तात्कालिक समाज के अनुरूप चरित्र निर्माण और जन-सेवा की भावनाओं की शिक्षा देने की
दृष्टि से कहा था | इसलिए उनका जीवन चरित्र जहाँ हमें एक ओर धार्मिक सिद्धांतों की
शिक्षा देता है तो दूसरी ओर जीवन को सुखमय बनाने का मार्ग भी सुझाता है |
ॐ ॐ ॐ ॐ
Comments