HE NAARI ! TU HAI MAHAN...........

                                     नारी की गरिमा

                         



            नारी के सम्बन्ध में जो कुछ भी वेद, स्मृति, इतिहास आदि में कहा गया है उस पर यदि आग्रह रहित हो गंभीरता से विचार किया जाए तो वह विवेक सम्मत, बुद्धि ग्राह्य एवँ आत्मप्रिय ही लगेगा, इसमें संदेह नहीं | यद्यपि विश्व में प्रचलित अन्य धर्मशास्त्रों में नारी को पुरुष के मनोरंजन की साधन सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथापि वैदिक धर्म के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता | वैदिक विचारधारा में न तो स्त्री पुरुष की दासी है और न वह उसके मनोरंजन की सामग्री ही, न तो वह पुरुष के पाँव की जूती है और न उसके सर का ताज ही | उसका उचित स्थान पुरुष का वामांग है | वह पुरुष की अर्धांगिनी है |
**इस विषय में मनुस्मृति के सिद्धांतानुसार नारी की उत्पत्ति के प्रसंग में पूर्व में बताया जा चुका है |  

                         आनंदमयी भारती

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