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                                  ‘कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुम्’

जन्माष्टमी के शुभ दिवस पर इस धरती में एक ऐसी दिव्य चेतना अवतरित हुई जिसने अपनी लीलाओं और अपने ज्ञान के द्वारा विश्व में जगतगुरु होने का सर्वोच्च पद प्राप्त किया | भगवान श्री कृष्ण माखन चुराते हुए और गोपियों के साथ लीला रचाते हुए जिस समता में स्थित रहते हैं उसी समता में वे कुरुक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध करते हुए भी स्थित रहते हैं | जीवन के हर उतार-चढ़ाव में श्री कृष्ण समवान रहे | कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मुस्कुराते हुए स्वीकार करनेवाले और युद्धभूमि के कोलाहल पूर्ण वातावरण में भगवद् गीता का उपदेश करने वाले भगवान् श्री कृष्ण के चरणों में हम नमन करते हैं |
प्राणिमात्र के जीवन पथ को रोशन करने, प्रगति के पथ अग्रसर करने के लिए श्रीमद् भगवद् गीता जैसा दूसरा कोई मार्गदर्शक नहीं है |१८ अध्याय और ७०० श्लोकों वाला यह अद्भुत ग्रंथ है | यह वह ज्ञान है जो भगवान श्री कृष्ण के श्रीमुख से अर्जुन को महाभारत की युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में सुनने को मिला | विश्व के तमाम धर्मग्रंथ गीता के सार ही हैं | जीवन जीने के सिद्धांत, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग का अगाध ज्ञान इसमें समाविष्ट है | जो व्यक्ति को अपने जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन देता है |
जीवन रूपी कुरुक्षेत्र में व्यक्ति के विकास के तमाम पक्षों को धारण करनेवाली गीता के ज्ञान को यहाँ संक्षेप में देने की कोशिश की जा रही है | जो मनुष्य सदा गीता में आसक्त होता है वह कभी कर्मों में लेपायमान नहीं होता, वह जीते जी मुक्त है ऐसा भगवान श्री कृष्ण का कहना है | भगवान कहते हैं “गीता मेरा अविनाशी ज्ञान हैं, मेरा परम रहस्य है और मेरा परम गुरु है |” जो गीता भगवान के लिए गुरुस्वरूप है, उससे बढ़कर पथप्रदर्शक मनुष्यों के लिए दूसरा कौन हो सकता है ?
निष्काम कर्मयोग की शिक्षा सबसे पहले श्री कृष्ण ने ही प्रदान की थी | कर्मयोग के विषय में गीता में कहा है कि “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”- तेरा कर्म करने में अधिकार है फल की प्राप्ति में नहीं | फल की आसक्ति का त्याग करके कर्म करो, सिद्धि-असिद्धि में समान रहकर कर्म करो | कर्म का फल तीन प्रकार का होता है इष्ट फल, अनिष्ट फल, मिश्रित फल | फल की इच्छा रखनेवाले व्यक्ति को उसके किये हुए कर्म बंधन में डालते हैं और चौरासी लाख योनियों के चक्कर में घुमाते हैं | जबकि फलेच्छा से रहित कर्म करनेवाले के कर्म उसकी मुक्ति का कारण बनते हैं | आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकता | इसलिए कर्मफल तो जीवात्मा को ही भुगतना पड़ता है |
दूसरे के धर्म का आचरण करने के बजाय मनुष्य के लिए अपना धर्म ही कल्याणकारक होता है |
जिसने अपने मन की सारी इच्छाओं और कामनाओं को त्याग दिया है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है, यानी वह सुख-दुःख के प्रति समान दृष्टि रखता है | सुख में फूलता नहीं और दुःख में दु:खी नहीं होता | गीता कहती है आलसी बनकर बैठने के बजाय और कर्म न करने के बजाय, कर्म करना अधिक श्रेयस्कर है | श्रेष्ठ मनुष्य जैसा आचरण करेंगे दूसरे लोग भी वैसा ही अनुकरण करेंगे | भगवान कहते हैं कि तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ भी करने जैसा नहीं है तो भी मैं कर्म करता हूँ, अतः सबको कर्म करना चाहिए |
         गीता कहती है ‘जैसे अग्नि लकड़े को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान सब कर्मों को भस्म कर देता है |’ जगत में ज्ञान से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है | द्रव्यमय यज्ञ से भी ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि सभी कर्म ज्ञान में ही समा जाते हैं | यहाँ ज्ञान का तात्पर्य ब्रह्मज्ञान से है | जो किसी से द्वेष नहीं करता, कोई इच्छा नहीं रखता, वह तो संसार में रहकर भी सन्यासी ही माना जायेगा | ज्ञानी कभी भी विषयों से उत्पन्न भोगों में फंसता नहीं क्योंकि वह दुःख का कारण है | मित्र-शत्रु, तटस्थ-मध्यस्थ, स्वजन-दुर्जन सब में वह समबुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है | भगवान् कहते हैं कि दुःखी, जिज्ञासु, धन की इच्छावाला और ज्ञानी ये सब मुझे भजते हैं परन्तु इन सबमें मुझे ज्ञानी ही सबसे अधिक प्रिय है | जो सबमें आत्मदृष्टि रखता है वही मनुष्य श्रेष्ठ है |
विश्व में जिसकी तुलना अन्य किसी के साथ नहीं हो सकती ऐसे जीवन पथ दर्शानेवाले, कर्त्तव्य ज्ञान देनेवाले इस गीता के इस अद्भुत ज्ञान को पचाने के लिए अनेक जन्म भी कम पड़ेंगे | गंगा की धारा की तरह गीता के श्लोकों के द्वारा बहता अविरत ज्ञान सुख-दुःख में सम रहकर जीवन जीने की कला सिखाता है, ज्ञान और भक्ति की महिमा को दर्शाता है, मनुष्य जीवन का उद्देश्य समझाता है | इस ज्ञान से निर्भयता, योगनिष्ठा, दान, यश, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, दया, मृदुता, अलोलुपता, तेज, धैर्य, निरभिमानता जैसे दैवी संपत्तियाँ मनुष्य को प्राप्त होती हैं |
श्रीमद् भगवद् गीता जहाँ एक ओर मन को शांति प्रदान करती है वहीं दूसरी ओर वेदों और उपनिषदों के ज्ञान को सरलता से समझाती है | इस पवित्र श्रावण मास एवं जन्माष्टमी में श्रीमद् भगवद् गीता पढ़कर, समझकर, जिवन में उतारने का संकल्प हम अवश्य करें |  

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