seva kaise kare?

                                     सेवा कैसे करे ?

इस संपूर्ण मानवजाति की सेवा ही साधना है|किन्तु सेवा किस प्रकार हो तो वह साधना बन जाये ?
सेवा विस्तार करने के भाव से नहीं बल्कि सम्पूर्ण जीवों का कल्याण हो इस भाव से करनी चाहिए |
सेवा अपना नाम उज्वल करने के लिये नहीं बल्कि जन जन के मन में सेवा का भाव जगाने के लिए करनी चाहिए |सेवा अपने अहंकार को मिटने के लिए होती है|अपना साम्राज्य फ़ैलाने के लिए नहीं होती है|
                      हां ! सेवा निस्वार्थ भाव से करते करते अपने आप जब मानव समाज जुड़े वह बात अलग है किन्तु,इतना विस्तार हो इसलिए सेवा करे यह भावना गलत है |दिन-दुखियों के दुःख दूर करने के लिए एवं मधुर मुस्कान उनके मुख पर आये इस भाव से ही सेवा करे |कर्ताभाव मिटने के लिए ,अहंकार रहित होने के लिए इस विश्व को आनंदित रखने के लिए ,सर्वत्र खुशहाली लाने  के लिए सेवा हो हमसे |..........!
                                                                 सेवा यही परमोधर्म है |
सेवा यही मानवधर्म है|    
सेवा यही देवधर्म है|
हमारी परम आराधना है सेवा|
 हमारा अध्यात्म है सेवा| 
हमारा धर्म है सेवा|
हमारी संस्कृति है सेवा|
हमारी धरोहर  है सेवा |
हमारा सर्वस्व है सेवा|

हमारा कर्म है सेवा|
हमारा सौन्दर्य है सेवा|
हमारी पूजा है सेवा|
हमारा आनंद है सेवा|
सेवा, सेवा  और सेवा यही है इश्वर  आराधना !
                                                      आनंदमयी ॐ 

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