naari sanskar
naari sanskar
हम जब आदर्श नारी के बारे में सोचते हैं तो हमारे सामने छवि आती है उन प्राचीन भारत की नारियों की जिन्होंने अपनी दिव्यता, बुद्धिमत्ता, पवित्रता, सच्चरित्रता और संकल्पबल से मनुष्यों को ही नहीं बल्कि भगवान तक को अपने आगे झुकने पर विवश कर दिया | उदाहरणार्थ गार्गी, सुलभा, सति अनुसूया, मदालसा, रानी चुड़ाला आदि |
भारतीय समाज में नारी का एक विशिष्ट गौरवपूर्ण स्थान रहा है और रहेगा | व्यव्हार में पुरुष-मर्यादा से नारी-मर्यादा सदा ही उत्कृष्ट मानी गयी है | हिन्दू संस्कृति इस भावना से परिपूर्ण है :-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: |
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: ||
जिस कुल में नारी का समादर होता है वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं और जहाँ ऐसा नहीं होता, उस परिवार में समस्त (यज्ञादि) क्रियाएँ व्यर्थ होती हैं | भारतीय गृहस्थ जीवन में इस श्लोक की व्यावहारिक सार्थकता सिद्ध होती है | पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित बुद्धि भले ही इस बात को हंसी में उड़ाए या इसे स्वीकार न करे फिर भी जिस मनुष्य की बुद्धि अपनी संस्कृति की महिमा को स्वीकार करती है उसकी बुद्धि इस बात को अवश्य स्वीकार करेगी | धर्मशास्त्र का स्पष्ट आदेश है :-
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने |
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातान्त्र्यमर्हती ||
बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति द्वारा तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं | स्त्री को कभी इनसे पृथक स्वतंत्र रहने का विधान नहीं है | धर्मशास्त्र द्वारा यह नारी-स्वातंत्र्य का अपहरण नहीं है | बल्कि यह तो नारी को निर्विघ्नरूप से अपना स्वधर्म पालन कर सकने के लिए बाह्य आपत्तियों से उसकी रक्षा के हेतु पुरुष समाज पर यह भार दिया गया है | धर्मभीरु पुरुष इसे भार नहीं समझते, धर्मरूप में स्वीकारकर अपना कल्याणकारी कर्त्तव्य समझते हैं | अत: नारी जाति में जो यह विचारधारा है कि शास्त्रों द्वारा नारी की स्वतन्त्रता का अपहरण किया गया है या उसके उन्नति पथ में बाधा डाली गई है वह गलत है | इन व्यवस्थाओं के द्वारा भी नारी की आत्मोन्नति का ही मार्ग बताया गया है |


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